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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

घिनौना अपराध बलात्कार

                   आखिर हमारे समाज को क्या होता जा रहा है? हमारा समाज आज गन्दा होता जा रहा है और इसमें गन्दगी कुछ बुरे और दबंग लोग फैला रहे हैं, जो कमजोर कानून  की वजह से बच रहे हैं आज अच्छाई की जगह बुराई पनप रही है और जो इंसान अच्छे के मार्ग पर चलना चाहता है उसको ये समाज को दुश्मन बाधा पहुँचाते हैं, यहाँ तक की उस बेचारे  की हत्या कर देते है और हमारा कमजोर, जर्जर और पुराना हो चुका कानून उस अपराधी का कुछ भी नहीं कर पाता है (सबूतों और गवाहों के ना होने पर ), इसी के कारण अपराध और बलात्कार की घटनाये दिन प्रतिदिन बढती जा रही हैं।
हवस का भूखा भेड़िया/जानवर, और अपनी लाज बचने की कोशिश करती ये नारी 
                  समाज में ना जाने बलात्कार की ये प्रवत्ति क्यों बढ़ रही है, इसका क्या कारण है, क्या उपाय है और क्या सजा होनी चाहिए इस पर न कभी सरकार ने ढंग से गौर किया है ना हमारे बुद्धिजीवियों ने और ना ही लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहे जाने वाले मीडिया ने और ना ही इसका कठोर निदान निकाल पाया है। अर्थात इसका कोई समुचित निदान अभी तक नहीं मिला या नहीं लागू हो पाया है।
                
                  अभी हाल ही में हमारे शहर में एक घटना हुई जिसमे एक ४८-५० साल के कर्मचारी ने, "जिसको शहर के बाल गृह में ड्यूटी पर लगाया गया था" ३-४ बच्चियों जिनकी उम्र १०-१२ साल है, के साथ ये घिनौनी हरकत की जबकि उसकी स्वयं के लड़की BA की छात्रा है और इसको शरम नहीं आई की मेरी लड़की क्या सोचेगी मेरे बारे में ?  इस व्यक्ति ने उन बच्चियों का काफी समय से यौन शोसन किया और इसमें उसका साथ दिया एक औरत ने जो की उस बाल गृह की अधीक्षिका है, अब बताइए औरत औरत की दुश्मन हुई की नहीं? पुरुष तो औरत को गलत और हमेशा अपने से कम सम्मान देता है ( अधिकांश पुरुष ऐसे नहीं हैं ), अब जब औरत ही औरत की दुश्मन या गुनाहगार बन जाएगी तो क्या होगा? ये बताना मेरे बस की बात नहीं है।  .बलात्कार जैसा वेशर्म घिनोना दुष्कृत्य कुंठित पुरुष द्वारा किया जाता है। और जीवन भर शर्म-सार पीड़िता को होना पड़ता है। अब तो सामूहिक बलात्कार कि खबर हर ३-४ दिन सुनाने को मिलती है।
बलात्कार और बलात्कारी से घृणा करो बलात्कार की पीड़ित से नहीं

बलात्कार कितना बड़ा जुर्म ?  

                    अब प्रश्न ये उठता है कि ये जुर्म कितना बड़ा है? और इससे पीड़ित को क्या न्याय मिलना चाहिए ? ये हत्या से बराबर या उससे अधिक का जुर्म माना  जा सकता है, क्योकि जिसकी हत्या होती है उसके परिवार वालो को ही दुःख होता है जबकि इस भयानक और घिनौनी वारदात से उसके परिवार वालो के साथ उस पीड़ित की जिन्दगी नरक बन जाती है और समाज ऐसे देखता है कि जैसे जुर्म, उसी पीड़ित ने किया हो (पाप से घृणा करो, जिस पर अपराध हुआ है उस पर नहीं ), ये मानो कि उसकी सारी जिन्दगी जेल की कालकोठरी से भी बदतर हो जाती है। यौवन अपराध के मामले में पीड़ित का क़ानून के हाथों इतना उत्पीड़न होता है कि वह रोज़ रोज़ अदालत के चक्कर काटने के बजाय घर पर ही बैठना उचित समझता है। अतः मै समझता हूँ कि बलात्कार और यौन शोषण सबसे बड़ा जुर्म है, और इसकी कोई माफी नहीं होनी चाहिए।

मेरी सोच (सजा के बारे में ) :-

                  बलात्कारी को सजा , इसमें बहुत लोगों का ये मत होगा की उसको फाँसी की सजा मिले या उसको जिंदगी भर  के लिए कारागार में डाल दिया जाये, पर मेरे अनुसार उस अपराधी को ऐसी सजायें मौत मिले जिससे उसकी और बहुत से अपराधियों की रूह कॉप जाए। मैंने किसी को कहते हुए सुना है कि जब तक इस प्रकार के बलात्कार की सज़ा बलात्कारी को नपुंसक बनाकर नहीं दी जाएगी, कोई कमी इन अपराधों मे नहीं आने वाली। जब तक नेताओ की बहन बेटियो का बलात्कार नही होगा तब तक इस देश से बलात्कारी नही डरेगे. कारण इस देश के क़ानून बनाने बाले नेता है और वो गंदी राजनीत और खुद के स्वार्थ के लिए क़ानून नही बनाएगे (ये उपाय भी गलत नहीं है)।
        यदि बलात्कार की घटना को पूरी तरह काबू पाना है, तो कठोर कदम उठाने पड़ेंगे समाज को और देश के कानून को भी, लोगो को जागरूक करने में मीडिया का अहम योगदान भी मदद  करेगा।  

1 टिप्पणी:

  1. संदीप भाई सर्व प्रथम आप हमारे ब्लाग http://ayurvedlight.blogspot.in पर आये आपने टिप्पणी दी उसके लिए आपका आभार और अगर हम लोग यू ही अपने हिन्दी ब्लागरो का सम्मान व सहयोग करते रहैं तो एक दिन हिन्दी भाषा का होगा क्योकि हिन्दी सर्व समर्थ भाषा है जो विचारों का ठीक से संम्पादन कर सकने में समर्थ है।
    आपका लेख समसामयिक विषय पर है और आपने आजकल की उस समस्या पर कुठारा घात किया है जिससे हमारा समाज सर्वाधिक दुःखी है औऱ सबसे ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि बैटियों के पिता ही सबसे ज्यादा इस घिनौनी व महापातक कर्म को करने में लगें है तो इसके लिए एसे लोगों की हिम्मत होती है आज के कानून को देख कर जो कानून स्वयं अपनी ही रक्षा नही कर पा रहा वह किसी दुष्ट को क्या दण्ड देगा। भाई जी अभी आपने देखा कि सरकार ने कसाव को फांसी दी कितना छिपकर जब सरकार उस काम को जो सरेआम होना चाहिये उसे ही छिपकर करने लगै तो आम जन के कानून पालन की आशा ही व्यर्थ है।हमारा संविधान अनेकों राष्ट्रो की झूठन से बना है.जो हमारे देश की प्रकृति से मेल नही खाता।हमारा संविधान हमारे स्वर्ण युग के संविधान से लेकर बनना चाहिये। http://rastradharm.blogspot.in पर आकर इस ब्लाग के पाठक गण अगर राष्ट्रीय विपत्तियों पर एक बार नजर डालना चाहैं तो क्लिक कर यहाँ पहुँच सकते हैं।आपके इस ब्लाग की इस घटना को में अपने रा्ष्ट्रधर्म ब्लाग पर लगा रहा हूँ वहाँ आकर देख सकते हैं ।
    पुनः आभार कृपया मेरे ब्लाग्स पर बार बार आये नयापन ही मिलेगा ज्ञानेश कुमार वार्ष्णेय

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